DMLT Pathshala – Lesson 2: रक्त संरचना क्या है और मानव शरीर में उसका प्रभाव 🩺
आज के इस पाठ में हम जानेंगे कि रक्त की संरचना क्या है और कैसे काम करती है, इसके ऊपर या नीचे होने पर हमारे शरीर पर क्या असर पड़ता है? बच्चों से लेकर वृद्धों तक यह किस तरह काम करता है? लेकिन उससे पहले, अगर आपने हमारा पहला पाठ नहीं पढ़ा है, तो पहले वह पढ़ लीजिए, वरना आपको इसे समझने में दिक्कत हो सकती है।
📑 अनुक्रमणिका (Table of Contents)
- 🩸 रक्त की संरचना (Composition of Blood)
- 🔍 रक्त की संरचना ऑक्सीजन के परिवहन को कैसे प्रभावित करती है?
- 🧪 रक्त की विभिन्न घटकों की जाँच कैसे की जाती है?
- 🧠 गुर्दा (किडनी) और यकृत (लिवर) रक्त की संरचना को कैसे प्रभावित करते हैं?
- ⚠️ रोग और परिस्थितियाँ जो रक्त की संरचना को प्रभावित करती हैं
- 📚 DMLT Pathshala क्या है?
रक्त की संरचना (Composition of Blood) 🩸
🔶 रक्त के दो मुख्य भाग होते हैं (Blood is divided into 2 parts):
रक्त को दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है – पहला है तरल भाग जिसे प्लाज्मा (Plasma) कहते हैं, जो कुल रक्त का 55% होता है। दूसरा भाग है ठोस भाग या Formed Elements, जो कुल रक्त का 45% होता है।
🔷 1.तरल भाग (Fluid Part) – Plasma (55%)
प्लाज्मा एक हल्के पीले रंग का तरल होता है जिसमें मुख्य रूप से तीन घटक होते हैं:
✅ पानी (Water) (90–92%)
यह प्लाज्मा का सबसे बड़ा भाग होता है। शरीर की तरलता को बनाए रखता है और पोषक तत्वों, हार्मोन, एंजाइम्स एवं गैसों को घुलाकर शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाता है।
✅ ठोस पदार्थ (Solid Materials) (8%)
इसमें प्रोटीन, ग्लूकोज़, विटामिन्स, हार्मोन, इलेक्ट्रोलाइट्स आदि शामिल होते हैं।
घटक | कार्य |
---|---|
Albumin | Osmotic pressure नियंत्रित करता है |
Globulin | रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) देता है |
Fibrinogen | रक्त का थक्का बनाने में सहायक |
✅ गैस (Gases) (<1%)
इसमें घुली हुई गैसें होती हैं जैसे Oxygen (O₂), Carbon dioxide (CO₂), और Nitrogen (N₂)। ये श्वसन और अन्य चयापचय क्रियाओं में सहायक होती हैं।
🔷 2. ठोस भाग (Solid Part) – Formed Elements (45%)
Formed elements तीन प्रकार के होते हैं: RBCs, WBCs और Platelets।
✅ RBC – Red Blood Cells (लाल रक्त कोष)
इन्हें Erythrocytes भी कहा जाता है। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऑक्सीजन को ले जाना होता है। इनकी संख्या सभी रक्त कोशिकाओं में सबसे अधिक होती है। हीमोग्लोबिन की उपस्थिति के कारण इनका रंग लाल होता है।
Life span: लगभग 120 दिन
Normal Count: 4.5 to 6 million/µL
✅ WBC – White Blood Cells (श्वेत रक्त कोष)
इन्हें Leukocytes कहते हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर की रक्षा करना होता है। इनकी संख्या कम होती है लेकिन आकार बड़ा होता है।
Life span: कुछ घंटों से लेकर कुछ दिन तक
Normal Count: 4,000–11,000 /µL
WBCs को दो भागों में बांटा जाता है:
🔵 A. Granulocytes (दानेदार कोशिकाएं)
इनके Cytoplasm में छोटे दाने (granules) होते हैं।
प्रकार | प्रतिशत | कार्य |
---|---|---|
Neutrophils | 50–70% | बैक्टीरिया और फंगल संक्रमण से लड़ते हैं, Phagocytosis करते हैं |
Eosinophils | 1–4% | एलर्जी और परजीवी संक्रमण में सहायक |
Basophils | <1% | Histamine छोड़ते हैं और सूजन तथा allergic प्रतिक्रिया में भाग लेते हैं |
🟢 B. Agranulocytes (बिना दाने वाली कोशिकाएं)
इनके Cytoplasm में granules नहीं होते।
प्रकार | कार्य |
---|---|
Monocytes | शरीर के सबसे बड़े WBC होते हैं। ये मृत कोशिकाओं और कीटाणुओं को साफ करते हैं। |
Lymphocytes | ये एंटीबॉडी बनाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। |
🔶 Lymphocytes दो प्रकार के होते हैं:
Small Lymphocytes
ये मुख्य रूप से B-Cells और T-Cells होते हैं और Adaptive immunity प्रदान करते हैं। ये वायरस से लड़ने में सहायक होते हैं।
Large Lymphocytes
ये Activated cells होते हैं। इनमें ज्यादा Cytoplasm होता है और ये सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
✅ प्लेटलेट (Platelets) (Thrombocytes)
ये चोट लगने पर खून का थक्का जमाने में सहायक होते हैं। इनमें nucleus नहीं होता।
Life span: 7–10 दिन
Normal Count: 1.5 to 4 लाख /µL
📊 Blood Composition – Tree Overview
यह संरचना रक्त के दो मुख्य भाग – Plasma और Formed Elements – के उपविभागों को सरल पेड़ (tree) रूप में दर्शाती है।
Blood
├── Plasma (55%)
│ ├── Water (90-92%)
│ ├── Solids (8%)
│ └── Gases (<1%)
└── Formed Elements (45%)
├── RBCs
├── WBCs
│ ├── Granulocytes
│ │ ├── Neutrophils (50-70%)
│ │ ├── Eosinophils (1-4%)
│ │ └── Basophils (<1%)
│ └── Agranulocytes
│ ├── Monocytes (2-8%)
│ └── Lymphocytes (20-40%)
│ ├── Small
│ └── Large
└── Platelets
रक्त की संरचना ऑक्सीजन के परिवहन को कैसे प्रभावित करती है? 🔍
शरीर की प्रत्येक कोशिका को जीवित रहने और कार्य करने के लिए निरंतर ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इस कार्य में रक्त, विशेषकर लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) और उनमें उपस्थित हीमोग्लोबिन (Hb) एक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। फेफड़ों से ऑक्सीजन ग्रहण कर ये कोशिकाएं उसे शरीर के विभिन्न ऊतकों तक पहुंचाती हैं। रक्त की संरचना में यदि थोड़ी भी गड़बड़ी हो जाए, जैसे हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया), RBC की संख्या में गिरावट या प्लाज्मा की अधिकता, तो इसका सीधा प्रभाव शरीर के ऑक्सीजन वहन क्षमता पर पड़ता है। इससे थकान, चक्कर, सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना और मस्तिष्क की कार्यक्षमता में गिरावट जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। इसके विपरीत, पॉलीसाइथेमिया जैसी स्थितियों में RBC की संख्या बहुत अधिक हो जाती है जिससे रक्त गाढ़ा हो जाता है और थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है।
रक्त में ऑक्सीजन की वहन क्षमता को प्रभावित करने वाले कई वैज्ञानिक कारक होते हैं जैसे कि pH स्तर, शरीर का तापमान, और 2,3-BPG (ग्लाइकोलिटिक बाय-प्रोडक्ट)। इन सभी का प्रभाव हीमोग्लोबिन और ऑक्सीजन के बंधन पर पड़ता है — जिसे ऑक्सी-हीमोग्लोबिन डिसोसिएशन कर्व द्वारा मापा जाता है। यदि pH गिरता है या तापमान बढ़ता है तो यह कर्व दाईं ओर शिफ्ट होता है जिससे ऊतकों को ऑक्सीजन छोड़ना आसान हो जाता है। इसी तरह कुछ रोग जैसे सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया या CO विषाक्तता (Carbon Monoxide poisoning) में हीमोग्लोबिन की कार्यक्षमता घट जाती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की डिलीवरी गड़बड़ा जाती है। यह सब दर्शाता है कि रक्त की सूक्ष्म संरचना भी शरीर के ऑक्सीजन वितरण को गहराई से प्रभावित करती है।
क्या आप जानते हैं?
हर 1 ग्राम हीमोग्लोबिन लगभग 1.34 मिलीलीटर ऑक्सीजन को बाँध सकता है। यदि किसी व्यक्ति में हीमोग्लोबिन 12 g/dL से कम हो जाता है, तो उसके शरीर की ऑक्सीजन वहन क्षमता में सीधा असर पड़ता है, जो थकान और सांस फूलने जैसे लक्षणों का कारण बनता है। इसी तरह, अधिक ऊँचाई पर रहने से शरीर RBC उत्पादन बढ़ाता है ताकि ऑक्सीजन की पूर्ति बनी रहे।
🧬 2,3-BPG क्या है?
2,3-BPG का पूरा नाम है 2,3-Bisphosphoglycerate (इसे कभी-कभी 2,3-DPG यानी 2,3-Diphosphoglycerate भी कहा जाता है)। यह एक जैव रासायनिक यौगिक है जो RBC (लाल रक्त कोशिकाओं) के अंदर बनता है और शरीर में ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2,3-BPG हीमोग्लोबिन के साथ जुड़कर उसकी ऑक्सीजन से पकड़ को कमज़ोर करता है। इससे क्या होता है?
➡ हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को जल्दी छोड़ता है, खासकर तब जब शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है — जैसे ऊंचाई पर, एक्सरसाइज के समय या जब ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी होती है।
यह एक प्राकृतिक एडजस्टमेंट मैकेनिज्म है जो सुनिश्चित करता है कि हमारे अंगों को जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन मिलती रहे।
🎯 सरल भाषा में:
2,3-BPG = हीमोग्लोबिन की पकड़ ढीली करने वाला दोस्त, ताकि वह ऑक्सीजन को समय पर रिलीज़ कर सके।
अगर यह ना हो तो हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को मजबूती से पकड़े रखेगा और शरीर के अंगों को उतनी ऑक्सीजन नहीं मिल पाएगी जितनी चाहिए।
रक्त की विभिन्न घटकों की जाँच कैसे की जाती है? 🧪
DMLT के छात्रों के लिए यह जानना आवश्यक है कि रक्त की जाँच केवल CBC तक सीमित नहीं होती, बल्कि विभिन्न परिस्थितियों और रोगों के अनुसार इसकी जाँच गहराई से की जाती है। लाल रक्त कोशिकाओं की स्थिति जानने के लिए CBC में RBC, हीमोग्लोबिन, हेमाटोक्रिट जैसे मानकों के अलावा रेटिकुलोसाइट गिनती, आयरन स्टडीज़ (सीरम आयरन, फेरिटिन, ट्रांसफरिन), विटामिन B₁₂ और फोलेट स्तर, और हेमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस जैसे टेस्ट शामिल होते हैं, जिनसे एनीमिया, थैलेसीमिया या हीमोलिटिक डिसऑर्डर का पता लगाया जाता है। श्वेत रक्त कोशिकाओं के लिए डिफरेंशियल काउंट के अलावा इम्यूनोफिनोटायपिंग (Flow Cytometry), साइटोजेनेटिक्स और क्वांटिटेटिव इम्युनोग्लोबुलिन्स की मदद से ल्यूकेमिया, लिम्फोमा या इम्यून डिफिशिएंसी जैसी बीमारियों का पता चलता है। प्लेटलेट्स के लिए मात्रात्मक संख्या के साथ-साथ प्लेटलेट एग्रीगेशन और वॉन विलिब्रांड फैक्टर की जांच से ब्लीडिंग डिसऑर्डर या थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया को समझा जा सकता है। प्लाज्मा और क्लॉटिंग संबंधित जांचों में PT/INR, aPTT और डीडाईमर जैसे टेस्ट शामिल हैं, जो यकृत रोग, DIC या एंटीकोआगुलेंट थेरेपी मॉनिटर करने में मदद करते हैं। इसी तरह, प्रोटीन मेटाबोलिज्म या गैस ट्रांसपोर्ट से जुड़ी स्थितियों में सीरम प्रोटीन इलेक्ट्रोफोरेसिस, एबीजी (Arterial Blood Gas), और को-ऑक्सीमेट्री जैसे उन्नत परीक्षण से ऑक्सीजन वहन क्षमता या एसिड-बेस असंतुलन को मूल्यांकित किया जाता है।
📦 जानकारी बॉक्स
क्या आप जानते हैं कि एक साधारण CBC टेस्ट से शुरू होकर, रक्त की गहन जांच में बोन मैरो बायोप्सी, हेमोग्लोबिन के प्रकारों की पहचान, एंटीबॉडी परीक्षण, और ऑक्सीजन के विभिन्न स्वरूपों की माप तक किया जा सकता है? DMLT छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर रोग की गहराई को जानने के लिए कौन-सा टेस्ट कब और क्यों उपयोगी है — क्योंकि हर घटक के पीछे एक संभावित बीमारी छुपी हो सकती है।
⚠️ DIC क्या है?
DIC का पूरा नाम है Disseminated Intravascular Coagulation (हिंदी में: विस्तृत आंतरिक रक्त थक्के बनने की प्रक्रिया)।
यह एक गंभीर और जानलेवा स्थिति होती है जिसमें शरीर के अंदर अत्यधिक और अनियंत्रित रक्त थक्के (clots) बनने लगते हैं — और वही थक्के बाद में जरूरत के समय खून जमने की क्षमता खत्म कर देते हैं, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव (bleeding) होने लगता है।
🧠 क्या होता है DIC में?
शरीर में कोई गंभीर संक्रमण (sepsis), प्रसव संबंधी जटिलता, कैंसर, सर्जरी, या आघात (trauma) DIC को ट्रिगर कर सकता है। शुरुआत में शरीर के रक्त में छोटे-छोटे थक्के बनने लगते हैं जो अंगों की रक्त आपूर्ति को रोकते हैं। धीरे-धीरे रक्त में थक्के बनाने वाले तत्व (जैसे प्लेटलेट्स और क्लॉटिंग फैक्टर्स) खत्म हो जाते हैं। इसके बाद जब खून को जमना चाहिए (जैसे किसी घाव या आंतरिक रक्तस्राव पर), तब खून जमता नहीं और भारी ब्लीडिंग शुरू हो जाती है।
🩺 DIC की पहचान कैसे होती है?
रक्त जाँच में PT, aPTT, फाइब्रिनोजन, D-Dimer, और प्लेटलेट काउंट की मदद से पता लगाया जाता है। ये सभी रिपोर्ट आमतौर पर असामान्य होती हैं।
🆘 यह क्यों खतरनाक है?
DIC एक मेडिकल इमरजेंसी है। अगर समय पर इलाज न मिले तो यह अंग विफलता (organ failure) और मृत्यु तक का कारण बन सकता है।
गुर्दा (किडनी) और यकृत (लिवर) रक्त की संरचना को कैसे प्रभावित करते हैं? 🧠
गुर्दा (Kidney) रक्त की संरचना और संतुलन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियंत्रक अंग है। यह दिनभर में लगभग 180 लीटर प्लाज्मा को ग्लोमेर्युलर निस्पंदन के माध्यम से फ़िल्टर करता है और नेफ्रॉन की नलिकाओं में से चयनात्मक रूप से सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, क्लोराइड, ग्लूकोज़ और पानी को पुनः अवशोषित करता है, जबकि अम्लीय तत्व, क्रिएटिनिन और औषधि-उपचय को उत्सर्जित करता है। यह प्रक्रिया इलेक्ट्रोलाइट संतुलन, रक्त की ऑस्मोलैरिटी और अम्ल-क्षार संतुलन को बनाए रखती है। इसके अलावा, किडनी रेनिन-एंजियोटेंसिन-ऐल्डोस्टेरोन तंत्र के ज़रिए रक्तचाप और द्रव संतुलन को नियंत्रित करती है। साथ ही, यह इरिथ्रोपोएटिन नामक हार्मोन बनाकर अस्थि मज्जा में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण को प्रेरित करती है और विटामिन D को उसके सक्रिय रूप काल्सिट्रियोल में परिवर्तित कर कैल्शियम-फॉस्फेट चयापचय को नियमित करती है। यदि किडनी खराब हो जाए तो रक्त में यूरिया, क्रिएटिनिन, इलेक्ट्रोलाइट्स और H⁺ आयन का असंतुलन हो जाता है, जिससे शरीर की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
यकृत (Liver) को शरीर की जैव-रासायनिक प्रयोगशाला कहा जाता है क्योंकि यह रक्त में पाए जाने वाले प्लाज्मा प्रोटीन, क्लॉटिंग फैक्टर, पित्त रस, और विविध एंजाइमों का निर्माण करता है। यह एल्बुमिन जैसे प्रोटीन के माध्यम से ऑन्कोटिक प्रेशर को नियंत्रित करता है और थक्के बनने वाले कारकों (जैसे फैक्टर I, II, VII, IX आदि) का संश्लेषण करता है, जिससे रक्तस्राव पर नियंत्रण बना रहता है। इसके अलावा, यह ग्लूकोज़ और लिपिड मेटाबॉलिज़्म, अमोनिया के डिटॉक्सिफिकेशन और बिलिरुबिन संयुग्मन जैसे कार्यों के माध्यम से रक्त की गुणवत्ता को बनाए रखता है। यदि यकृत में सिरोसिस या हेपेटाइटिस जैसी समस्या हो जाए, तो एल्बुमिन का स्तर घट जाता है जिससे शरीर में सूजन या एसाइटिस हो सकता है, क्लॉटिंग फैक्टर की कमी के कारण रक्तस्राव का खतरा बढ़ता है और बिलिरुबिन की असंतुलन से पीलिया उत्पन्न होता है। यकृत के खराब होने से थ्रोम्बोपोएटिन का निर्माण भी कम हो जाता है, जिससे प्लेटलेट्स की संख्या में गिरावट आती है। इस तरह, किडनी और लिवर दोनों ही रक्त की संरचना को स्वस्थ बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
रोग और परिस्थितियाँ जो रक्त की संरचना को प्रभावित करती हैं ⚠️
रक्त की संरचना हमारे शरीर की स्थिति और बीमारियों के अनुसार बदल सकती है। उदाहरण के लिए, एनीमिया में हीमोग्लोबिन या RBC की संख्या घट जाती है, जिससे ऑक्सीजन वहन क्षमता कम हो जाती है। आयरन की कमी, विटामिन B12 या फोलेट की कमी और हेमोलिटिक डिसऑर्डर इसके सामान्य कारण होते हैं। ल्यूकोसाइट विकारों में WBC की संख्या बढ़ या घट सकती है—जैसे संक्रमण, कीमोथेरेपी या ल्यूकेमिया में। प्लेटलेट असामान्यताओं के कारण थ्रोम्बोसाइटोपेनिया या थ्रोम्बोसाइटोसिस हो सकता है जिससे रक्तस्राव या थक्का जमने की प्रवृत्ति में बदलाव आता है। किडनी की बीमारी में EPO की कमी से एनीमिया हो सकता है और यूरिया की अधिकता प्लेटलेट कार्य को प्रभावित करती है। हार्मोनल असंतुलन, डिहाइड्रेशन, ओवरहाइड्रेशन, क्रॉनिक इंफ्लेमेशन, कैंसर, गर्भावस्था या ऊँचाई पर रहना — ये सभी स्थितियाँ रक्त के विभिन्न घटकों पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।
स्थिति / रोग | रक्त पर प्रभाव |
---|---|
आयरन की कमी वाला एनीमिया | हीमोग्लोबिन ↓, MCV ↓, सीरम फ़ेरिटिन ↓ |
मेगालोब्लास्टिक एनीमिया | MCV ↑, हाइपरसेगमेंटेड PMN |
हेमोलिटिक एनीमिया | LDH ↑, बिलिरुबिन ↑, रेटिकुलोसाइट ↑ |
ल्यूकोसाइटोसिस | WBC ↑ (बैक्टीरिया, ल्यूकेमिया) |
ल्यूकोपेनिया | WBC ↓ (वायरल, कीमोथेरेपी) |
थ्रोम्बोसाइटोपेनिया | प्लेटलेट्स ↓ (डेंगू, ITP, सिरोसिस) |
थ्रोम्बोसाइटोसिस | प्लेटलेट्स ↑ (इंफ्लेमेशन, कैंसर) |
क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ | EPO ↓ → नॉर्मोसाइटिक एनीमिया |
डिहाइड्रेशन | हेमोकॉन्सेंट्रेशन (Hct ↑, TP ↑) |
गर्भावस्था | Hb ↓, प्लाज्मा ↑, क्लॉटिंग फैक्टर ↑ |
ऊँचाई पर रहना | EPO ↑ → RBC मास ↑ |
कैंसर या कीमोथेरेपी | पैंसाइटोपेनिया, थ्रोम्बोसाइटोसिस |
DMLT Pathshala क्या है? 📚
DMLT Pathshala एक ऐसा ब्लॉग शृंखला है जहाँ हम सरल हिंदी भाषा में मेडिकल लैब तकनीशियन के कोर्स को समझने में मदद करते हैं। हमारा उद्देश्य है कि छात्र और सामान्य पाठक दोनों को एक गहराई से लेकिन आसान तरीके से जानकारी मिले।
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